20 July, 2009

सूर्यग्रहण का प्रभाव (Effect of Solar Eclipse)

२२ जुलाइ २००९ को खग्रास सूर्यग्रहण भारत में दिखाई देगा. चीन, मध्य स्पेसिफिक महासागर, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान में भी सूर्यग्रहण दिखाई देगा.

अहमदाबाद (गुजरात) में सूर्यग्रहण का समय :
सूर्यग्रहण का वेध मंगलवार शाम को :०० बजे से शुरू होगा.
ग्रहण स्पर्श : ०५:३१:५४
ग्रहण मध्य : ०६:२३:४३
ग्रहण मोक्ष : ७:२०:२४


सूर्यग्रहणका प्रभाव :
ये सूर्य ग्रहण कर्क राशि तथा पुष्य नक्षत्र में घटित हो रहा है। अत: इस राशि तथा नक्षत्रों में पैदा हुए जातक / जातिका के लिए यह ग्रहण विशेष रूप से अशुभ प्रभाव वाला रहेगा । १२ राशिः वाले जातको के लिए सूर्यग्रहण का प्रभाव इस प्रकार रहेगा :

Aries : कार्य सिद्धि
Taurus : आर्थिक लाभ
Gemini : आर्थिक नुकसान
Cancer : चोट लगने का भय या बिमारी
Leo : व्यापर में नुकसान
Virgo : नोकरी में बढती
Libra : रोग, कष्ट भय
Scorpio : गुप्त चिन्ता
Sagittarius : आर्थिक लाभ
Capricorn : स्त्री कष्ट
Aquarius : रोग, कष्ट
Pisces : मान हानि, खर्च

सूर्यग्रहण के प्रभाव से बचने का उपाय :
- कर्क राशिवाले चाँदी के पात्र में अन्न / घी भरकर संकल्पपूर्वक दान दें ।
- अन्य राशिवाले जिनको ग्रहण का अशुभफल हो, वें ताँबे या काँसे के पात्र में अन्न / घी भरकर ब्राह्मणको दान करे ।
- सूर्य गायत्री मन्त्र का जाप करें ।
मंत्र : ॐ भास्कराय विद्महे महातेजाय धीमहि, तन्नो सूर्यः प्रचोदयात्‌ ।
- नवग्रह सम्बन्धी औषधि स्नान भी कल्याणप्रद है ।

10 July, 2009

महाशिवरात्रि की कथा

एक बार पार्वती ने भगवान शिवशंकर से पूछा, 'ऐसा कौन सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्यु लोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?'

उत्तर में शिवजी ने पार्वती को 'शिवरात्रि' के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- 'एक गाँव में एक शिकारी रहता था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधवश साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।

शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया।

अपनी दिनचर्या की भाँति वह जंगल में शिकार के लिए निकला, लेकिन दिनभर बंदीगृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल-वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढँका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।

पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए।

एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुँची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, 'मैं गर्भिणी हूँ। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं अपने बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब तुम मुझे मार लेना।' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी झाड़ियों में लुप्त हो गई।

कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे पारधी ! मैं थोड़ी देर पहले ही ऋतु से निवृत्त हुई हूँ। कामातुर विरहिणी हूँ। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूँ। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊँगी।'

शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर न लगाई, वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, 'हे पारधी! मैं इन बच्चों को पिता के हवाले करके लौट आऊँगी। इस समय मुझे मत मार।'

शिकारी हँसा और बोला, 'सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे।'

उत्तर में मृगी ने फिर कहा, 'जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी, इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान माँग रही हूँ। हे पारधी! मेरा विश्वास कर मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ।'

मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के आभाव में बेलवृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्व करेगा।

शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला,' हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि उनके वियोग में मुझे एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूँ। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण जीवनदान देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊँगा।'

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटना-चक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।'

उपवास, रात्रि जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गए। भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।

थोड़ी ही देर बाद मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया।

देव लोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहा था। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए।'

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श्रावण मासका महत्व

भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग तीर्थ हैं। शिवपुराण में इन ज्योतिर्लिंग का उल्लेख है। इनके दर्शन मात्र से सभी तीर्थों का फल प्राप्त होता है। आकाश जिसका लिंग है, पृथ्वी उसकी पीठ है।

पद्म पुराण के पाताल खंड के अष्टम अध्याय में ज्योतिर्लिंगों के बारे में कहा गया है कि जो मनुष्य इन द्वादश ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करता है, उनकी समस्त कामनाओं की इच्छा पूर्ति होती है। स्वर्ग और मोक्ष का वैभव जिनकी कृपा से प्राप्त होता है।

शिव के त्रिशूल की एक नोक पर काशी विश्वनाथ की नगरी का भार है। पुराणों में ऐसा वर्णित है कि प्रलय आने पर भी काशी को किसी प्रकार की क्षति नहीं होगी।

भारत में शिव संबंधी अनेक पर्व तथा उत्सव मनाए जाते हैं। उनमें श्रावण मास भी अपना विशेष महत्व रखता है। संपूर्ण महीने में चार सोमवार, एक प्रदोष तथा एक शिवरात्रि, ये योग एकसाथ श्रावण महीने में मिलते हैं। इसलिए श्रावण का महीना अधिक फल देने वाला होता है। इस मास के प्रत्येक सोमवार को शिवलिंग पर शिवामूठ च़ढ़ाई जाती है। वह क्रमशः इस प्रकार है :

प्रथम सोमवार को- कच्चे चावल एक मुट्ठी, दूसरे सोमवार को- सफेद तिल्ली एक मुट्ठी, तीसरे सोमवार को- ख़ड़े मूँग एक मुट्ठी, चौथे सोमवार को- जौ एक मुट्ठी और यदि पाँचवाँ सोमवार आए तो एक मुट्ठी सत्तू च़ढ़ाया जाता है।

महिलाएँ श्रावण मास में विशेष पूजा-अर्चना एवं व्रत अपने पति की लंबी आयु के लिए करती हैं। सभी व्रतों में सोलह सोमवार का व्रत श्रेष्ठ है। इस व्रत को वैशाख, श्रावण, कार्तिक और माघ मास में किसी भी सोमवार को प्रारंभ किया जा सकता है। इस व्रत की समाप्ति सत्रहवें सोमवार को सोलह दम्पति (जो़ड़ों) को भोजन एवं किसी वस्तु का दान देकर उद्यापन किया जाता है।

शिव की पूजा में बिल्वपत्र अधिक महत्व रखता है। शिव द्वारा विषपान करने के कारण शिव के मस्तक पर जल की धारा से जलाभिषेक शिव भक्तों द्वारा किया जाता है। शिव भोलेनाथ ने गंगा को शिरोधार्य किया है।

शिव का ग्यारहवाँ अवतार हनुमान के रूप में हुआ है। संपूर्ण श्रावणमास में शिव भक्तों द्वारा शिवपुराण, शिवलीलामृत, शिव कवच, शिव चालीसा, शिव पंचाक्षर मंत्र, शिव पंचाक्षर स्तोत्र, महामृत्युंजय मंत्र का पाठ एवं जाप किया जाता है। श्रावण मास में इसके करने से अधिक फल प्राप्त होता है।

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ऑफिस में योग कैसे करे ?

ऑफिस में कार्य करते हुए मन और शरीर दोनों पर प्रभाव पड़ता है। मन तनाव से ‍घिर जाता है तो शरीर में गर्दन, रीढ़, कंधे और आँखें अकड़न और दर्द का शिकार हो जाती हैं। तनाव जहाँ हमें कुंठा से ग्रस्त कर हमारे स्नायुतंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है वहीं सीट पर लगातार 9 से 10 घंटे बैठे रहने से गर्दन, कंधे और रीढ़ की हड्डी में अकड़न और दर्द पैदा हो जाता है।

दूसरी ओर लम्बी अवधि तक निरंतर कम्प्यूटर को देखते रहने के कारण उससे निकलने वाली हानिकर किरणें हमारी आँखों को कमजोर करती रहती हैं। लगातार तनाव बना रहने के कारण हम कुंठाग्रस्त तो ही जाते हैं साथ ही सिरदर्द, श्वास संबंधी रोग, कब्ज और अनावश्यक डर आदि का शिकार हो जाते हैं।

उक्त सारी शिकायतों के कारण हमारी कार्यक्षमता और व्यवहार में गिरावट आती रहती है। जबकि हमारे पास उक्त सारी मुश्किलों से निपटने का समय भी न हो तो ऐसे में योग के कुछ ऐसे उपाय अवश्य करें जिनको करते रहने से गंभीर रोगों से बचा जा सकता है।

सही मुद्रा में बैठें :
सर्वप्रथम आप ऑफिस चेयर्स पर सही मुद्रा में बैठना सीखें। आरामपूर्ण व सहज बैठने या खड़े रहने का सबसे अनिवार्य रूप से अभ्यास किया जाना चाहिए। अकसर हम सही मुद्रा में खड़े या बैठे नहीं रहने के कारण समस्याओं से घिर जाते हैं। इस कारण रीढ़ की हड्डी़, कंधे, गर्दन और आँखों में शिकायत का शिकार हो जाते हैं।

आँखें : जितनी पास देखते हैं उसे कहीं दूर देखने और पढ़ने का सहज क्रम जारी रखें अन्यथा दूर दृष्टि कमजोर होने लगेगी। सूक्ष्म योग अनुसार आगे और सीधे देखो। धीरे-धीरे आँखों की पुतलियों को दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे और फिर गोल-गोल घुमाएँ। छत पर देखें, फर्श पर देखें। फिर दूर दीवार पर देखें। कम से कम 30 सेकंड के लिए आँखें बंद कर दें। ऐसा कम से कम पाँच बार करें तो आँखें रिफ्रेश होती रहेंगी।

गर्दन : गर्दन को आराम से दाएँ घुमाकर कुछ देर तक दाएँ ही रखें। फिर इसी तरह धीरे-धीरे बाएँ घुमाएँ। तत्पश्चात्य ऊपर और नीचे करें। 15 सेकंट तक ऊपर और 15 सेकंड तक नीचे रखें। फिर दाएँ से बाएँ गोल-गोल घुमाएँ फिर बाएँ से दाएँ गोल-गोल घुमाएँ। इसे ब्रह्म मुद्रा भी कहते हैं।

कंधे : कंधे की समस्याओं से अकसर लोग पीड़ित रहते हैं। उसका कारण है लगातार टाइपिंग करना या निरंतर माउस संचालित करते रहना। कंधे का महत्वपूर्ण जोड़ बॉल और साकेट होता है। अँगुलियों के पोरों को एक-दूसरे से मिलाते हुए उन्हें कंधे पर रखें। फिर कोहनियों को दाएँ से बाएँ और बाएँ से दाएँ घुमाएँ। ठीक इसके विपरीत भी।

रीढ़ : रीढ़ की हड्डी में लगातार दर्द बने रहने के कारण या इसकी निष्क्रियता से साँसों के रोग, क्रानिका, एम्फीजिमा, स्लिप्ड डिस्कसिण्ड्रोम, लम्बर स्पांडिलोसिस, आदि कई तरह के रोगों का जन्म हो सकता है।

रीढ़ की बीमारी से बचने के पहले सीधे खड़े हो जाएँ। हाथ नीचे स्वाभाविक स्थिति में रखें। इस स्थिति में हाथ कोहनी से मोड़े बगैर खिंचे हुए पीछे की और ले जाएँ। इसी के साथ गर्दन ऊपर उठाकर गहरी श्वास लें।

तनाव : ऑफिस में तनाव होने के कई कारण हो सकते हैं। तनाव से निजात पाने के लिए अनुलोम-विलोम का नियमित अभ्यास करें और नकारात्मक विचारों और भावों को अपने पास फटकने न दें। सिर्फ एक मिनट के ध्यान और प्राणायाम के छोटे से उपाय से शांति पाई जा सकती है।

अत्यधिक विचार, भीड़, शोर और प्रदूषण हमारे ‍मस्तिष्क की शांति को भंग करते हैं। अशांत और बेचैन रहने की भी आदत हो जाती है। उक्त आदतों से सिर्फ ध्यान और प्राणायाम ही छुटकारा दिला सकता है।

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05 July, 2009

Gruri Vrat

Gauri Vrat is observed by unmarried girls. Belief is that Goddess Parvati (Gauri) had observed this vrat to get Lord Shiva as her spouse and hence it is believed that unmarried girls who observe this vrat will get the best husband. Gauri Vrat commences from the eleventh day of the bright half of the month of Ashada in North Indian Hindu Calendar. The young girls grow tender shoots of corn at home in a small pot. They worship the tender shoots and the Sun. The vrat ends on the Purnima day. On this day the girls perform 'cow puja'. They also pay farewell to Goddess Parvati.

03 July, 2009

समलैंगिक सम्बन्ध को कानूनी मान्यता !!

समलैंगिक संबंधों की वैधता के लिए २ जुलाई दिन ऐतिहासिक माना जाएगा। दिल्ली हाईकोर्ट ने माना कि आपसी सहमति से वयस्क समलैंगिक संबंध स्थापित कर सकते है और इसे अपराध नहीं माना जा सकता। दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिक संबंधों को वैध ठहराया है

‘हे भगवान! यह देश कहाँ जा रहा है?’’
जगद्गुरू कहलाने वाला भारत आज किस संस्कृति की ओर अग्रसर हो रहा है ?

दुनियाभर में भारतीय पारिवारिक तंत्र प्रणालीको सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। कानून या अदालत की नजर में समलैंगिकता जायज है। लेकिन हिंदू धर्मं और भारतीय पारिवारिक तंत्र प्रणालीकी नजर में समलैंगिकता कितना जायज है ?

क्या कोई भी कानूनी विशेषज्ञ, न्यायविद् और राजनीतिक अपने बेटे या बेटी के समलैंगिक संबंधों पर सहमत होगा ? हमारे माता-पिता समलैंगिक होते तो हम पैदा ही नहीं होते और यदि हम समलैंगिक होंगे तो हमारे बच्चे ही पैदा नहीं होंगे।

क्या ये मान लिया जाए कि अदालत के इस फैसले ने विकृति की चरम अवस्था तक का रास्ता तैयार कर दिया हे ? कृपया अपनी राय Comment Box में लिखे।

Chaturmas

The period between Ashad sud ekadashi (2 July 2009) to Kartik sud ekadashi (30 Oct 2009) is referred to as the Chaturmas, literally, 4 months. During this time, all disciples will take extra vows such as fasting, scripture recitals, meditation and other religious observances.

A story is narrated in the Purans about the deity Ekadashi, such named because she emerged from the one of the Lord's indriya. There are 5 gnaan indriya, senses, and 5 karma indriya, the controlling organs of these senses. The mind controls all the organs so is considered the 11th organ. Ekadashi literally means eleven, ek + dash, 1 + 10 = 11. The deity Ekadashi was granted her wish and was allowed by the Lord to reside in his eyes for the duration of the chaturmas. Thus the Lord is said to hibernate during this period. That is why the Ashad sud 11 is also referred to as the Devshayani (dev - Lord, shayan - sleep) ekadashi. During the period that the Lord is resting, disciples will practice extra religious practices (niyams) to please the Lord.

On a practical level, this time period is when the monsoon season falls in India. As a result of the heavy rainfalls, it would be impossible for the wandering sages and preachers to travel the land to preach and offer spiritual guidance. Therefore, during this period they would remain resident at one place. As they are no longer travelling, they have spare time, which is occupied with the extra vows, and thus they further please the Lord.

During these four months we have lot of festivals. Some are religious in nature while others have a social significance and importance-Immediately after the advent of Chaturmas we get the Guru Poornima. Thereafter comes the month of Shravana. This month is full of important days. Shravana Mondays are important for the worship of Lord Shankar. The Poornima in this month is the Narali Poornima which marks the end of heavy rain and the throwing of the coconut in the sea appeases the sea and it calms down.

During this four months Some religious books like Mahabharat, Ramayan, Bhagwat or Vishnu Sahastra could be read everyday according to the time available to everyone. Somebody could undertake to pay a daily visit to a certain temple. Others could take a vow to do "Mantra Jap" of a certain mantra for a certain number of times everyday.