19 October, 2014

Shree Suktam


Shree Suktam (Sri Suktam) is a Sanskrit devotional hymn revering Shree as Goddess Lakshmi of wealth and prosperity. Shree Suktam is one of the best ways to worshipping of Goddess Lakshmi. Devotees who recite Shree Suktam daily never suffer from poverty.


ॐ हिर॑ण्यवर्णां॒ हरि॑णीं सु॒वर्ण॑रज॒तस्र॑जाम् ।
चंद्रां हि॒रण्म॑यीं ल॒क्ष्मीं जात॑वेदो म॒ आव॑ह ॥
तां म॒ आव॑ह॒ जात॑वेदो ल॒क्ष्मीमन॑पगा॒मिनी॓म् ।
यस्यां॒ हिर॑ण्यं वि॒देयं॒ गामश्वं॒ पुरु॑षान॒हम् ॥
अ॒श्व॒पू॒र्वां र॑थम॒ध्यां ह॒स्तिना॓द-प्र॒बोधि॑नीम् ।
श्रियं॑ दे॒वीमुप॑ह्वये॒ श्रीर्मा दे॒वीर्जु॑षताम् ॥
कां॒ सो॓स्मि॒तां हिर॑ण्यप्रा॒कारा॑मा॒र्द्रां ज्वलं॑तीं तृ॒प्तां त॒र्पयं॑तीम् ।
प॒द्मे॒ स्थि॒तां प॒द्मव॑र्णां॒ तामि॒होप॑ह्वये॒ श्रियम् ॥
चंद्रां प्र॑भा॒सां य॒शसा॒ ज्वलं॑तीं॒ श्रियं॑ लो॒के दे॒वजु॑ष्टामुदा॒राम् ।
तां प॒द्मिनी॑मीं॒ शर॑णम॒हं प्रप॑द्ये‌உल॒क्ष्मीर्मे॑ नश्यतां॒ त्वां वृ॑णे ॥
आ॒दि॒त्यव॑र्णे तप॒सो‌உधि॑जा॒तो वन॒स्पति॒स्तव॑ वृ॒क्षो‌थ बि॒ल्वः ।
तस्य॒ फला॑नि॒ तप॒सानु॑दंतु मा॒यांत॑रा॒याश्च॑ बा॒ह्या अ॑ल॒क्ष्मीः ॥
उपैतु॒ मां दे॒वस॒खः की॒र्तिश्च॒ मणि॑ना स॒ह ।
प्रा॒दु॒र्भू॒तो‌உस्मि॑ राष्ट्रे॒‌உस्मिन् की॒र्तिमृ॑द्धिं द॒दादु॑ मे ॥
क्षुत्पि॑पा॒साम॑लां ज्ये॒ष्ठाम॑ल॒क्षीं ना॑शया॒म्यहम् ।
अभू॑ति॒मस॑मृद्धिं॒ च सर्वां॒ निर्णु॑द मे॒ गृहात् ॥
ग॒ंध॒द्वा॒रां दु॑राध॒र्षां॒ नि॒त्यपु॑ष्टां करी॒षिणी॓म् ।
ई॒श्वरीग्ं॑ सर्व॑भूता॒नां॒ तामि॒होप॑ह्वये॒ श्रियम् ॥
मन॑सः॒ काम॒माकूतिं वा॒चः स॒त्यम॑शीमहि ।
प॒शू॒नां रू॒पमन्य॑स्य मयि॒ श्रीः श्र॑यतां॒ यशः॑ ॥
क॒र्दमे॑न प्र॑जाभू॒ता॒ म॒यि॒ संभ॑व क॒र्दम ।
श्रियं॑ वा॒सय॑ मे कु॒ले मा॒तरं॑ पद्म॒मालि॑नीम् ॥
आपः॑ सृ॒जंतु॑ स्नि॒ग्दा॒नि॒ चि॒क्ली॒त व॑स मे॒ गृहे ।
नि च॑ दे॒वीं मा॒तरं॒ श्रियं॑ वा॒सय॑ मे कु॒ले ॥
आ॒र्द्रां पु॒ष्करि॑णीं पु॒ष्टिं॒ सु॒व॒र्णाम् हे॑ममा॒लिनीम् ।
सू॒र्यां हि॒रण्म॑यीं ल॒क्ष्मीं जात॑वेदो म॒ आव॑ह ॥
आ॒र्द्रां यः॒ करि॑णीं य॒ष्टिं पि॒ंग॒लाम् प॑द्ममा॒लिनीम् ।
चंद्रां हि॒रण्म॑यीं ल॒क्ष्मीं॒ जात॑वेदो म॒ आव॑ह ॥
तां म॒ आव॑ह॒ जात॑वेदो ल॒क्षीमन॑पगा॒मिनी॓म् ।
यस्यां॒ हिर॑ण्यं॒ प्रभू॑तं॒ गावो॑ दा॒स्यो‌உश्वा॓न्, वि॒देयं॒ पुरु॑षान॒हम् ॥
ॐ म॒हा॒दे॒व्यै च॑ वि॒द्महे॑ विष्णुप॒त्नी च॑ धीमहि ।
तन्नो॑ लक्ष्मीः प्रचो॒दया॓त् ॥

श्री-र्वर्च॑स्व॒-मायु॑ष्य॒-मारो॓ग्य॒मावी॑धा॒त् पव॑मानं मही॒यते॓ ।
धा॒न्यं ध॒नं प॒शुं ब॒हुपु॑त्रला॒भं श॒तसं॓वत्स॒रं दी॒र्घमायुः॑ ॥


ॐ शांतिः॒ शांतिः॒ शांतिः॑ ॥

18 October, 2014

Shri Hanuman Chalisa with Meaning


श्री हनुमान चालीसा अर्थ सहित


श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मनु मुकुर सुधारि।
बरनऊँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौ पवन कुमार।
बल बुधि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेस विकार॥
सद्गुरु के चरण कमलों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को स्वच्छ कर, श्रीराम के दोषरहित यश का वर्णन करता हूँ जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चार फल देने वाला है। स्वयं को बुद्धिहीन जानते हुए, मैं पवनपुत्र श्रीहनुमान का स्मरण करता हूँ जो मुझे बल, बुद्धि और विद्या प्रदान करेंगे और मेरे मन के दुखों का नाश करेंगे ।

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥१॥
राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥२॥
श्री हनुमान की जय हो जो ज्ञान और गुण के सागर हैं, तीनों लोकों में वानरों के ईश्वर के रूप में विद्यमान श्री हनुमान की जय हो॥ आप श्रीराम के दूत, अपरिमित शक्ति के धाम, श्री अंजनि के पुत्र और पवनपुत्र नाम से जाने जाते हैं ।

महावीर विक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी॥३॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥४॥
आप महान वीर और बलवान हैं, वज्र के समान अंगों वाले, ख़राब बुद्धि दूर करके शुभ बुद्धि देने वाले हैं, आप स्वर्ण के समान रंग वाले, स्वच्छ और सुन्दर वेश वाले हैं, आपके कान में कुंडल शोभायमान हैं और आपके बाल घुंघराले हैं ।

हाथ वज्र औ ध्वजा बिराजै।
काँधे मूँज जनेऊ साजै॥५॥
शंकर सुवन केसरीनंदन।
तेज प्रताप महा जग बंदन॥६॥
आप हाथ में वज्र (गदा) और ध्वजा धारण करते हैं, आपके कंधे पर मूंज का जनेऊ शोभा देता है, आप श्रीशिव के अंश और श्रीकेसरी के पुत्र हैं, आपके महान तेज और प्रताप की सारा जगत वंदना करता है ।

विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर॥७॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लषन सीता मन बसिया॥८॥
आप विद्वान, गुणी और अत्यंत बुद्धिमान हैं, श्रीराम के कार्य करने के लिए सदैव उत्सुक रहते हैं, आप श्रीराम कथा सुनने के प्रेमी हैं और आप श्रीराम, श्रीसीताजी और श्रीलक्ष्मण के ह्रदय में बसते हैं ।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
विकट रूप धरि लंक जरावा॥९॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे।
रामचंद्र के काज सँवारे॥१०॥
आप सूक्ष्म रूप में श्रीसीताजी के दर्शन करते हैं, भयंकर रूप लेकर लंका का दहन करते हैं, विशाल रूप लेकर राक्षसों का नाश करते हैं और श्रीरामजी के कार्य में सहयोग करते हैं ।

लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥११॥
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥१२॥
आपने संजीवनी बूटी लाकर श्रीलक्ष्मण की प्राण रक्षा की, श्रीराम आपको हर्ष से हृदय से लगाते हैं। श्रीराम आपकी बहुत प्रशंसा करते हैं और आपको श्रीभरत के समान अपना प्रिय भाई मानते हैं ।

सहस बदन तुम्हरो जस गावै।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावै॥१३॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा॥१४॥
आपका यश हजार मुखों से गाने योग्य है, ऐसा कहकर श्रीराम आपको गले से लगाते हैं। श्री सनक, श्री सनातन, श्री सनन्दन, श्री सनत्कुमार आदि मुनि ब्रह्मा आदि देवता नारदजी, सरस्वती, शेषनाग सब आपका गुण गान करते है ।

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।
कबि कोविद कहि सके कहाँ ते॥१५॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राजपद दीन्हा॥१६॥
यम, कुबेर आदि दिग्पाल भी आपके यश का वर्णन नहीं कर सकते हैं, फिर कवि और विद्वान कैसे उसका वर्णन कर सकते हैं। आपने सुग्रीव का उपकार करते हुए उनको श्रीराम से मिलवाया जिससे उनको राज्य प्राप्त हुआ ।

तुम्हरो मंत्र विभीषन माना।
लंकेश्वर भए सब जग जाना॥१७॥
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥१८॥
आपकी युक्ति विभीषण माना और उसने लंका का राज्य प्राप्त किया, यह सब संसार जानता है। आप सहस्त्र योजन दूर स्थित सूर्य को मीठा फल समझ कर खा लेते हैं ।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लाँघि गए अचरज नाहीं॥१९॥
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥२०॥
प्रभु श्रीराम की अंगूठी को मुख में रखकर आपने समुद्र को लाँघ लिया, आपके लिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इस संसार के सारे कठिन कार्य आपकी कृपा से आसान हो जाते हैं ।

राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥२१॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रच्छक काहू को डरना॥२२॥
श्रीराम तक पहुँचने के द्वार की आप सुरक्षा करते हैं, आपके आदेश के बिना वहाँ प्रवेश नहीं होता है, आपकी शरण में सब सुख सुलभ हैं, जब आप रक्षक हैं तब किससे डरने की जरुरत है ।

आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हाँक तें काँपै॥२३॥
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै॥२४॥
अपने तेज को आप ही सँभाल सकते हैं, तीनों लोक आपकी ललकार से काँपते हैं। केवल आपका नाम सुनकर ही भूत और पिशाच पास नहीं आते हैं ।

नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥२५॥
संकट तें हनुमान छुडावैं।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥२६॥
महावीर श्री हनुमान जी का निरंतर नाम जप करने से रोगों का नाश होता है और वे सारी पीड़ा को नष्ट कर देते हैं। जो श्री हनुमान जी का मन, कर्म और वचन से स्मरण करता है, वे उसकी सभी संकटों से रक्षा करते हैं ।

सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा॥२७॥
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोइ अमित जीवन फल पावै॥२८॥
सबसे पर, श्रीराम तपस्वी राजा हैं, आप उनके सभी कार्य बना देते हैं। उनसे कोई भी इच्छा रखने वाले, सभी लोग अनंत जीवन का फल प्राप्त करते हैं ।

चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा॥२९॥
साधु संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे॥३०॥
आपका प्रताप चारों युगों में विद्यमान रहता है, आपका प्रकाश सारे जगत में प्रसिद्ध है। आप साधु- संतों की रक्षा करने वाले, असुरों का विनाश करने वाले और श्रीराम के प्रिय हैं ।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता॥३१॥
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा॥३२॥
आप आठ सिद्धि और नौ निधियों के देने वाले हैं, आपको ऐसा वरदान माता सीताजी ने दिया है। आपके पास श्रीराम नाम का रसायन है, आप सदा श्रीराम के सेवक बने रहें ।

तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै॥३३॥
अंत काल रघुबर पुर जाई।
जहाँ जन्म हरि – भक्त कहाई॥३४॥
आपके स्मरण से जन्म- जन्मान्तर के दुःख भूल कर भक्त श्रीराम को प्राप्त करता है और अंतिम समय में श्रीराम धाम (वैकुण्ठ) में जाता है और वहाँ जन्म लेकर हरि का भक्त कहलाता है ।

और देवता चित न धरई।
हनुमत से हि सर्व सुख करई॥३५॥
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥३६॥
दूसरे देवताओं को मन में न रखते हुए, श्री हनुमान से ही सभी सुखों की प्राप्ति हो जाती है। जो महावीर श्रीहनुमान जी का नाम स्मरण करता है, उसके संकटों का नाश हो जाता है और सारी पीड़ा ख़त्म हो जाती है ।

जै जै जै हनुमान गोसाई।
कृपा करहु गुरुदेव की नाई॥३७॥
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई॥३८॥
भक्तों की रक्षा करने वाले श्री हनुमान की जय हो, जय हो, जय हो, आप मुझ पर गुरु की तरह कृपा करें। जो कोई इसका सौ बार पाठ करता है वह जन्म-मृत्यु के बंधन से छूटकर महासुख को प्राप्त करता है ।

जो यह पढ़ै हनुमान चलीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥३९॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ ह्रदय महँ डेरा॥४०॥
जो इस श्री हनुमान चालीसा को पढ़ता है उसको सिद्धि प्राप्त होती है, इसके साक्षी भगवान शंकर है । श्री तुलसीदास जी कहते हैं, मैं सदा श्रीराम का सेवक हूँ, हे स्वामी! आप मेरे हृदय में निवास कीजिये ।

10 October, 2014

Diwali Muhurat - Year 2014


Pushya Nakshtra :
Purchase Account Books, Gold, Silver
(1) Date: 16 Oct. 2014, Thursday, Aswin Krishna Paksh 8
Best Time - Guru Pushya Yoga : (IST)
(Pushya Nakshatra Starts at 10:47 am)
12:26 pm to 03:19 pm
04:46 pm to 07:46 pm

(2) Date: 17 Oct. 2014, Friday, Aswin Krishna Paksh 9
Best Time : (IST)
08:05 am to 10:59 am
12:25 pm to 01:37 pm
(Pushya Nakshatra Ends at 1:37 pm)

Dhan Teras :
Perform Lakshmi / Kuber / Dhanvantari Pujan
Date: 21 Oct. 2014, Tuesday, Aswin Krishna Paksh 13
Best Time : (IST)
10:59 am to 01:51 pm
03:17 pm to 04:43 pm
07:43 pm to 09:17 pm
10:51 pm to 01:13 am
(Dhan Teras Ends at 1:13 am)

Kaali Chaudas :
Perform Grah Jap, Bhairav and Hanuman Puja
Date: 22 Oct. 2014, Wednesday, Aswin Krishna Paksh 14
Best Time : (IST)
06:41 am to 09:33 am
10:59 am to 12:24 pm
04:42 pm to 06:08 pm
07:42 pm to 10:50 pm

Diwali (Deepavali) :
Perform Lakshmi / Sharda Pujan / Chopda Pujan
Date: 23 Oct. 2014, Thursday, Aswin Krishna Amavasya
Best Time : (IST)
06:41 am to 08:07 am
12:24 pm to 03:16 pm
04:42 pm to 09:16 pm

New Year :
Date: 24 Oct. 2014, Friday, Kartak Shukla Paksh 1
Best Time : (IST)
06:42 am to 10:59 am
12:24 pm to 01:50 pm
04:41 pm to 06:07 pm

Labh Pancham :
Date: 28 Oct. 2014, Tuesday, Kartak Shukla Paksh 5
Best Time : (IST)
09:34 am to 01:49 pm
03:14 pm to 04:39 pm
07:34 pm to 09:14 pm

Wish you a Happy Diwali

(Muhurats are calculated as per Ahmedabad, India)